Urban Fictionary

पढ़िए और समझिये। सरकार के हर कदम का सपोर्ट करने वाले प्रकाश पाण्डे की GST, नोटबंदी की वजह से आत्महत्या दुखद है।

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प्रकाश पांडेय की आत्महत्या की खबर से अब तक बाहर नहीं आ पाया हूँ ,जहां कहीं भी कुछ भी पढ़ने को मिल रहा है पढ़ ही रहा हूँ अभी उनकी प्रोफाइल मिल गयी ,कुछ पोस्ट्स देखने लगा ,उनकी विचारधारा को समझने की कोशिश कर रहा था ,अगर वो ज़िंदा होते तो उनसे खूब असहमतियां होतीं ,अगर वो मेरी फ्रेंड लिस्ट में होते तो मुझे भी खूब गालियां दे रहे होते या ब्लॉक कर चुके होते ,मैं यही सोच रहा था कि जिस पार्टी के साथ वे खड़े थे ,और जिनका विरोध वे कर रहे थे ,उसके बावजूद भी आज वही लोग जो बिल्कुल उनकी ही विचारधारा के हैं उनके साथ नहीं हैं ,वे तो उनके आत्महत्या करने के लिए किसी को जिम्मेदार ही नहीं मान रहे ,उल्टा जिसने आत्महत्या की उसकी ही आलोचना कर रहे हैं ,प्रकाश पांडेय से वैचारिक असहमति के साथ साथ भाषायी संस्कारों के न होने के चलते भी मेरी उनसे असहमति खूब रहती ,ये सब मन किया तो यूं ही लिख दिया ,मूल बात बस इतनी सी है कि आप जब तक उनके साथ हैं तब तक आप भले हैं उनकी आलोचना करने पर आपको भी अलग कर दिया जाएगा जैसे प्रकाश जी को कर दिया गया ,और किसी को फर्क नहीं पड़ेगा आप ज़िंदा हैं या मर रहे हैं ,हाँ कोई मेरे जैसा सिरफिरा आपकी खबर सुनकर व्याकुल जरूर होगा और आपके लिये लिखेगा ,आपकी ओर से लिखेगा ,और लिखता रहेगा,प्रकाश जी हम गौरी लंकेश अखलाख अयूब पंडित पहलू खान के साथ साथ आपकी मौत का जवाब भी हुक्मरानों से मागेंगे ,वो अलग बात है कि आप एक बूढ़े निहत्थे आदमी की वीडियो बनाकर हत्या कर डालने वाले शम्भू को अपना हीरो मानते रहे ,प्रकाश पांडे जी अगर आप ज़िंदा होते तो मैं आपको बताता की आरक्षण दलितों का हक है ,खैरात नहीं ,अगर आप ज़िंदा होते तो मैं आपको सौ तर्कों से समझाने की कोशिश करता कि धर्म आस्था का मसला है राजनीति का नहीं ,मुझे मालूम है आप मुझे वामपंथी बताने में नहीं हिचकते ,लेकिन मैं आपको लिबरल बनाने की पुरजोर कोशिश करता ,मैं आपको सेक्युलरिजम के हवाले से ये बताने में दिन रात एक कर देता कि सेक्युलर होकर भी अच्छा हिन्दू और नेक इंसान बना जा सकता है ,मुसलमानों को गरिया के नहीं ,मैं आपको बताता कि कट्टरता से देश और समाज टूटते हैं ,धर्म नहीं बचता ,कट्टरता धर्म के लिए जहर होती है और आदमी के लिए कैंसर ,कट्टरता से ज्यादा बुरा तो कुछ होता ही नहीं ,काश कि हम एक बार मिल पाते ,काश कि एक बार हमारी बात हो पाती ,मैं आर्थिक रूप से इतना मजबूत तो नहीं कि आपके नुकसान की भरपाई कर पाता ,मगर मैं आपको आपका आत्म हत्या करने का फैसला बदलने पर मजबूर जरूर कर देता ,फिर शायद आप भी मुझे अच्छा समझने लगते ,मुझसे प्यार करने लगते।

~अंशुल कृष्णा